श्रीराम वन गमन पथ के नाम पर भी प्रदेश में घोटाला

(भोपाल) हिन्दुओं के आदर्श और भारतीय जनता पार्टी की सत्ता की सीढ़ी मानी जानेवाले मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की त्रेतायुगीन स्मृतियों से जुड़े धार्मिक व पुरातत्विक संरक्षण और संवर्धन के नाम पर भी इस प्रदेश में करोड़ों रुपये खर्च करके श्रीराम वन गमन पथ बनाने की घोषणा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा २१ मई २००७ को चित्रकूट में की गई थी लेकिन मजे की बात यह है कि जिस प्रदेश में मंत्रियों, अधिकारियों, सत्ता के दलालों और ठेेकेदारों की सांठगांठ से रैकेट संचालित हो रहा हो उसी मध्यप्रदेश में यह कैसे संभव होगा कि वह भ्रष्टाचार के मामले में भगवान श्रीराम को भी बख्श दें और ऐसा ही हुआ यहां सरकार द्वारा इस निर्माण कार्य के लिये आरईएस विभाग को दो करोड़ तीस लाख रुपये की राशि इस कार्य के लिये आवंटित की गई लेकिन जैसा इस प्रदेश की पिछले दस वर्षों से एक परम्परा बन गई है कि सरकारी योजनाओं में चूना लगाकर अपनी तिजोरी भरने का काम प्रदेश में चल रहे इस रैकेट के संरक्षण में धड़ल्ले से चल रहा है चूंकि इसमें सत्ताधीशों से लेकर सत्ता के दलाल और अधिकारी भी शामिल रहते हैं तो इनपर कोई कार्यवाही नहीं होती है, स्थिति यह है कि इस कार्य के लिये चित्रकूट के सरभंगा में निर्माण कार्य कराये गये लेकिन लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी मुख्य मार्ग से सरभंगा आश्रम तक आरसीसी रोड का निर्माण तो किया गया लेकिन उसमें गिट्टी और मुरम का उपयोग धड़ल्ले से किया गया तो वहीं दस लाख रुपये की राशि से सरभंगा आश्रम से घोड़ामुखी देवी मंदिर तक मंदाकिनी नदी तक का सौंदर्यीकरण किया गया लेकिन उसमें भी महज खानापूर्ति कर दी गई। तो वही कुछ स्थानों पर १५ लाख रुपये की लागत से सौर्य ऊर्जा विद्युतीकरण का काम किया गया लेकिन आजतक वह रोशन नहीं हो सके, तो संत कुटीर साधना स्थल भवन का निर्माण भी बीस लाख रुपये से किया गया लेकिन उसमें गुणवत्ता का कहीं अता-पता नहीं है। इसी तरह से एक लाख रुपये में यात्री प्रतीक्षालय का निर्माण किया जाना था लेकिन उसका अभी तक अता-पता ही नहीं है। तो वहीं सरभंगा आश्रम के सामने मंदाकिनी का जीर्णोद्धार एवं सौंदर्यीकरण का काम किया जाना था, इस कार्य के लिये दस लाख रुपये खर्च कर दिए गए लेकिन वह भी शोपीस बनकर रह गया लेकिन इस कार्य में गुणवत्ता दिखाई नहीं दे रही है। सरभंगा आश्रम से यज्ञवेदी महाड़ी तक ५०० मीटर लंबी सीढ़ी और दोरों ओर रेलिंग का निर्माण २५ लाख रुपये से किया जाना था लेकिन यह निर्माण कहां हुआ यह ढूंढे से भी नहीं मिलेगा। यज्ञवेदी का सौंदर्यीकरण पांच लाख रुपये से किया जाना था लेकिन इसका भी निर्माण कागजों में कर दिया गया। इसी तरह से क्षेत्र में बीस लाख की लागत से तीन स्टाप डेमों का निर्माण कराया जाना था लेकिन एकमात्र स्टाप डेम का निर्माण कराकर कार्य की इतिश्री कर दी गई। पुरातत्व महत्व की मूर्तियों के संग्रहालय के लिये पांच लाख की लागत से संग्रह एवं भवन का निर्माण किया जाना था लेकिन इतना छोटा भवन बना दिया कि पुरातत्व महत्व की और संग्रहालय का कुछ पता ही नहीं चल पा रहा है। मजे की बात यह है कि इस घोटाले की की जांच को लेकर कई बार आवाजें उठीं लेकिन आजतक इसकी जांच नहीं हो सकी, लोगों का कहना है कि यदि इस सभी कार्यों का भौतिक सत्यापन कराया जाए तो पूरा का पूरा घोटाला सामने उजागर हो जाएगा, लेकिन अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं और जैसे कि मध्यप्रदेश सरकार के निर्माण कार्यों की फर्जीवाड़े की परम्परा इस प्रदेश में बदस्तूर चल रही है वह भी इसी नीति के भेंट चढ़ गई।

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