स्वाथ्य विभाग घोटालों और भ्रष्टाचार के चलते बेहतर सेवा देने में हुआ नाकाम

(भोपाल)। जिस प्रदेश में संविधान में दी गई भारतीय नागरिकों के प्रदत्त अधिकारों का हनन करने का सिलसिला इस कदर हावी है कि प्रदेश सरकार संविधान में दिये गये नागरिकों को स्वास्थ्य शिक्षा और पानी नि:शुल्क उपलब्ध कराने में असमर्थ है, इसका मुख्य कारण है कि इन संविधान में प्रदत्त स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधा को उपलब्ध कराने के लिये यूं तो सरकार द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किये गये लेकिन भारतीय जनता पार्टी के इन १२ वर्षों के शासनकाल के दौरान ना तो प्रदेश में शिक्षा की स्थिति में कोई सुधार हुआ है और जहां तक पानी का सवाल है तो प्रदेश सरकार राज्य के नागरिकों को नि:शुल्क पानी उपलब्ध कराने में भी असफल साबित हो रही है तभी तो राजधानी जैसे महानगर में कभी नर्मदा के नाम पर तो कभी विकास के नाम पर पानी के बिलों में कर और उपकर जोड़े जाने के बावजूद भी राजधानी के नागरिकों को नि:शुल्क पानी उपलब्ध नहीं करा पा रही है लगभग यही स्थिति पूरे मध्यप्रदेश की है चाहे प्रदेश का कोई महानगर हो या दूरदराज का आदिवासी टोला पानी को लेकर हर कोई परेशान है और उसे शुद्ध पानी यह सरकार मुहैया नहीं कर पा रही है, पानी और शिक्षा की बात छोडिय़े यह सरकार तो संविधान में दिये गये अधिकारों का हनन करने में भी लगी हुई है और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधा भी प्रदेश की जनता को उपलब्ध कराने में नाकाम साबित हुई है तभी तो प्रदेश के २७ जिलों को अब निजी डॉक्टरों के हवालें सौंपने की तैयारी करने में जुट गई है। सरकारी आंकड़ों और स्वास्थ्य विभाग को प्रतिवर्ष आवंटित बजट पर यदि निगाह डालें तो प्रदेश के नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के लिये प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये स्वास्थ्य विभाग को दिये गये लेकिन स्वास्थ्य विभाग में मंत्री, अधिकारियों, सत्ता के दलालों और ठेकेदारों के रैकेट के चलते इस राशि को बजाए जनता के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की बजाए अपनी तिजोरियों में भरना बेहतर समझा इस विभाग के भ्रष्टाचार के भी चर्चे आम हैं, इस विभाग में पदस्थ अभी तक अधिकारियों के यहां से जब भी छापे की कार्यवाही की गई तो करोड़ों रुपये बक्सों में वाशिंग मशीन में और ना जाने कहां कहां से बरामद हुए हैं, इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रदेश के नागरिकों के बेहतर स्वास्थ्य बनाने के लिये यह विभाग कितना गंभीर है, इस विभाग में पदस्थ अधिकारियों के द्वारा शासकीय बजट में चूना लगाने वालों की भी एक लम्बी फेहरिस्त है जिसमें राजेश राजौरा, योगीराज शर्मा, अमरनाथ मित्तल और अशोक शर्मा ही नहीं बल्कि प्रदेश के जिले स्तर पर पदस्थ सीएमएचओ से लेकर फार्मासिस्ट का दवाईयों का कमिशन का जो खेल चल रहा है वह भी अपने आपमें अजीब है, तो वहीं इस तरह के गोलमाल और भ्रष्टाचार के आरोपों का दाग से स्वास्थ्य विभाग के मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा भी अछूते नहीं हैं, इन पर भी जब अमरनाथ मित्तल के यहां छापे की कार्यवाही हुई थी तो उस समय उनकी पत्नी के द्वारा मंत्री को एक करोड़ रुपये देने का आरोप लगाया था हालांकि जैसा राजनीति में होता आया है उसका खंडन भी आ गया। स्वास्थ्य विभाग की यह दुर्दशा जहां विभाग के मंत्री से लेकर अधिकारियों की कारगुजारी के चलते तो हुई है तो वहीं सत्ता में बैठे लोगों और निजी चिकित्सालयों को सरकार द्वारा बढ़ावा देना भी एक मुख्य कारण है, इससे यह लगता है कि राज्य सरकार स्वयं प्रदेश की जनता को स्वास्थ्य सेवाएं देने से मुकर रही है तभी तो निजी चिकित्सालय चिरायु में जाकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान वाल्व बदलने जैसी महत्वपूर्ण योजना को प्रारंभ करने में नहीं हिचकते हैं, यही नहीं जहां तक मुख्यमंत्री का सवाल है तो एक बार जब वह अचानक हमीदिया अस्पताल में पहुंच गए थे तो वहां की व्यवस्था देखकर उन्होंने अपनी घोषणा करने की परम्परा के क्रम में यह घोषणा कर डाली थी कि अब मैं अपना उपचार हमीदिया में ही करवाऊंगा लेकिन शायद इस घोषणा के बाद ऐसा कोई सौभाग्य हमीदिया के डॉक्टरों और चिकित्सकों को मिला हो कि मुख्यमंत्री वहां अपना उपचार कराने गए हों। तो वहीं दूसरी ओर प्रदेश सरकार द्वारा अपनी स्वास्थ्य सेवाओं की नाकामी को छुपाने के लिए लम्बे समय से अपने कर्मचारियों, अधिकारियों के उपचार के लिये निजी अस्पतालों की एक लम्बी चौड़ी सूची बनाकर मान्यता दे रखी है। विधानसभा में कांग्रेस के विधायक मुकेश नायक के एक प्रश्न के उत्तर में सरकार ने यह स्वीकार किया है कि राज्य में किसी भी सरकारी अस्पताल में लीवर और किडनी प्लांटेशन की सुविधा नहीं है जबकि प्रदेशभर में करोड़ों रुपये के तमाम उपकरण कमीशन के फेर में खरीदकर धूल खा रही हैं और उन्हें संचालित करने वाले विशेषज्ञों की सरकार के पास उपलब्ध नहीं है, इसी सब गोलमाल के चलते राज्य के २७ जिलों में फिलहाल प्रयोग के तौर पर निजी डॉक्टरों के हवाले इन जिलों के नागरिकों की सुविधा उपलब्ध कराने की तैयारी में सरकार लगी हुई है और अब यह काम एक स्वयंसेवी संस्था के हाथों सौंपने जा रही है जहां तक स्वास्थ्य के सूचकांक का सवाल है तो स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट का खुलासा होने के बाद राज्य सरकार ने यह फैसला लिया है कि सूत्रों के मुताबिक इस बात का खुलासा किया गया है कि प्रदेश के २७ जिलों में डॉक्टरों की संख्या और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से लेकर मातृ शिशु मृत्यु दर को कम करने में सरकार डॉक्टरों की कमी से जूझ रही है, तो सरकार इन जिलों में सरकारी डॉक्टरों को भेजने में भी नाकाम साबित हुई है, जब प्रदेश की जनता की तरह सरकार के स्वास्थ्य विभाग का स्वास्थ्य ही गड़बड़ाने लगा तो सरकार ने गुजरात के बड़ौदा के दीपक फाउण्डेशन के साथ हाल ही में एक करार किया है, एनजीओ इन जिलों में अपने डॉक्टर तैनात करेगी, उनकी तनख्वाह तकरीबन सवा लाख महीना होगी, सरकार ने इन जिलों को हाई फोकस जिले माने हैं उनकी मानिटरिंग का जिम्मा स्वास्थ्य विभाग के संभागीय संयुक्त संचालक को सौंपा गया है, कुल मिलाकर विगत १२ वर्षों से राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार प्रदेश की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने का झुनझुना जरूर पकड़ाती रही लेकिन फिर भी वह लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाई और यह सब खेल भ्रष्टाचार के बीच वायदों का खले चलता रहा और आज यह स्थिति आ गई कि राज्य के २७ जिलों की स्वास्थ्य सेवाएं निजी हाथों में सौंपकर सरकार भारतीय संविधान में दिये गये नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करने में लगी हुई है।

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