टाइम्स हायर एजुकेशन ‘ब्रिक्स तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं के विश्वविद्यालय’ सम्मेलन में राष्ट्रपति का संबोधन

टाइम्स हायर एजुकेशन ‘ब्रिक्स तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं के विश्वविद्यालय’ सम्मेलन में राष्ट्रपति का संबोधन

मुझे टाइम्स हायर एजुकेशन ‘ब्रिक्स तथा उभरती अर्थव्यवस्थाओं के विश्वविद्यालय’ सम्मेलन, 2015 में प्रतिनिधियों को संबोधित करने का अवसर पाकर बहुत प्रसन्नता हुई है। मैं सम्मानित प्रतिनिधियों का स्वागत करता हूं। मैं टाइम्स हायर एजुकेशन और भारत में उनके साझेदार ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी को उभरती अर्थव्यवस्थाओं की विश्वस्तरीय विश्वविद्याल आवश्यकता विषय पर यह सम्मेलन आयोजित करने के लिए बधाई देता हूं। मुझे प्रसन्नता है कि सम्मेलन में ब्रिक्स क्षेत्र के देशों के प्रतिनिधि और अनेक उभरती और विकसित अर्थव्यवस्था वाले देशों के प्रतिनिधि एक स्थान पर उच्च शिक्षा की चुनौतियों तथा शैक्षिक संस्थाओं के अंतर्राष्ट्रीय मानक पर चर्चा के लिए आए हैं।

देवियों और सज्जनोः

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली विश्व की बड़ी प्रणालियों में एक है। इसमें 712 विश्वविद्यालय और 36,000 से अधिक कॉलेज हैं। भारत में उच्च शिक्षा के विस्तार से हम पूरे देश में उच्च शिक्षा तक पहुंच बनाने में सफल हुए हैं। लेकिन हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षा की गुणवत्ता एक बड़ी चुनौती है।

एक समय था जब भारत उच्च शिक्षा प्रणाली में महत्वपूर्णँ भूमिका अदा करता था। हमारे यहां तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी, सोमापुरा तथा ओदंतपुरी जैसे विख्यात शिक्षा केंद्र थे। लेकिन हम अपने आकार, संस्कृति और सभ्यता के अनुरूप विश्व रैंकिंग में स्थान पाने में विफल रहे हैं। भारत को अतीत का गौरव प्राप्त करने के लिए काम करना होगा । उच्च शिक्षा के 114 संस्थानों के विजिटर होने के नाते मैं लगातार इस बात पर बल दे रहा हूं कि कैसे हम अपनी रैंकिंग में सुधार करें। मैं यह नहीं मानता कि एक भी विश्वविद्यालय अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में स्थान पाने के मानक का नहीं है।

मुझे प्रसन्नता है कि दो भारतीय संस्थान विश्व के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में शामिल किए गए हैं। एक संस्थान इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी श्रेणी में शीर्ष 100 संस्थानों में आता है। यह मेरी दृढ़ मान्यता है कि भारत में अनेक उच्च शिक्षण संस्थान हैं जो विश्व में श्रेष्ठ होने की क्षमता रखते हैं।

देवियों और सज्जनों ,

शिक्षा की गुणवत्ता का सीधा संबंध समावेशी वृद्धि और विकास से है। उभरती अर्थव्यवस्थाएं अपने नागरिकों की विकास अपेक्षाओं को पूरा करने की चुनौती झेल रही हैं। हमें विश्व के श्रेष्ठ की तुलना में शिक्षा प्रणाली बनानी होगी। उच्च शिक्षा में गुणवत्ता की चिंता पर गंभीर संवाद शुरु किया जाना चाहिए।

उच्च शिक्षा क्षेत्र को स्वयं को वैश्विक शिक्षा क्षेत्र से जुड़ना होगा। स्वतंत्र भारत के पहले विश्वविद्यालय आयोग, जिसे राधाकृष्णन आयोग कहा जाता है, ने कहा था कि हमारे विश्वविद्यालयों में विश्व मस्तिष्क और राष्ट्रीय भावनाओं की आवश्यकता है। हाल के समय में विद्वानों, संस्थागत प्रशासकों तथा नीति निर्माताओं के बीच विश्व स्तरीय विश्वविद्यालयों में दिलचस्पी बढ़ी है। आज के समय में एक विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय वह है जो पूरे विश्व को अपना मान कर समाज की वैश्विक समस्याओं का समाधान कर सके ।

मानक तय करने वाली अधिकतर एजेंसियां रिसर्च आउटपुट और शिक्षण संस्थान के अंतर्राष्‍ट्रीय रूप को अधिक महत्व देती हैं। मानक पूरा करने के लिए संस्थानों को विश्व मान्य गुणवत्ता संपन्न शोध पर बल देना चाहिए। इससे उनके विश्व स्तरीय बनने के प्रयासों को बल मिलेगा। ऐसे विश्वविद्यालयों को अपनी पहुंच विश्‍व स्‍तर तक पहुंचानी होगी। संचार और आदान प्रदान बढ़ाना होगा और पूरी दुनिया में लोगों की आवाजाही बढ़ानी होगी। विश्‍व दृष्टि अपनाने से संस्‍थान को विश्‍व के उच्‍च शिक्षा समुदाय में स्‍वीकार्यता मिलने में मदद मिलेगी। इससे संस्‍थान की अकादमिक प्रतिष्‍ठा भी बढ़ेगी।

विश्‍व‍स्‍तरीय विश्‍वविद्यालय बनने के प्रयास कर रहे विश्‍वविद्यालयों के पास उच्‍च गुणवत्‍ता संपन्‍न फैकल्‍टी सदस्‍य, मेधावी विद्यार्थी, पढ़ाने और सीखने का माहौल को प्रोत्‍साहन , संसाधन उपलब्‍धता, ठोस अवसंरचना तथा स्‍वायत्‍तता संपन्‍न और मजबूत प्रशासनिक ढांचा होने चाहिए। कई बार विश्‍व रैंकिंग के मानक यथार्थ और विभिन्‍न देशों की सामाजिक राजनीतिक स्थिति को नहीं दिखाते। इसीलिए अनेक देशों ने अपनी रैंकिंग व्‍यवस्‍था की है जिसके मानक घरेलू सुविधा के अनुसार हैं। भारत के मामले में शैक्षिक संस्‍थानों के मूल्‍यांकन के लिए हाल में एक राष्‍ट्रीय संस्‍थागत रैंकिंग रूपरेखा विकसित की गई है। राष्‍ट्रीय मूल्‍यांकन एवं प्रत्‍यायन परिषद (एनएएसी-नेक) भी इस क्षेत्र में उच्च शिक्षा संस्थानों के मूल्यांकन एवं प्रत्‍यायन का काम कर रही है। मैं मानता हूं कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली शिक्षण संस्थानों में दायित्व और गुणवत्ता पर बल देंगी।

ब्रिक्स अर्थव्यवस्था 3 बिलियन लोगों की है जो विश्व आबादी का 42 प्रतिशत है। ब्रिक्स देशों की सम्मिलित जीडीपी 16 ट्रिलियन डालर से अधिक है और विश्व में 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। यह सम्मेलन ब्रिक्स देशों की उच्च शिक्षा क्षेत्र की क्षमता को मानता है।

आज के वैश्विक युग में तीन ‘सी’ यानी कोलेबोरेशन, को-आपरेशन और कम्यूनिकेशन के उपयोग के अपार अवसर हैं। इससे विश्व स्तरीय विश्वविद्यालय बन सकते हैं। मैं आशा करता हूं कि यह सम्मेलन निजी क्षेत्र के सहयोग से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए नवाचारी समाधान प्रस्तुत करेगा ताकि उच्च शिक्षा प्रणाली को मजबूत बनाया जा सके।

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