महाकाल: प्रमुख ज्योतिर्लिंग

महाकाल: प्रमुख ज्योतिर्लिंग

भोपाल भारत के इतिहास में उज्जयिनी का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। रामायण, महाभारत, विविध पुराणों तथा काव्य ग्रंथों में इसका आदरपूर्वक उल्लेख हुआ है। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से इसका अद्वितीय स्थान है। इसी पावन नगरी के दक्षिण-पश्चिम भू-भाग में पुण्य-सलिला क्षिप्रा के पूर्वी तट से कुछ ही अन्तर पर भगवान् महाकालेश्वर का विशाल मंदिर स्थित है। महाकाल की गणना द्वादश ज्योतिर्लिंगों में की गयी है, जो शिव-पुराण में दिये गये द्वादश ज्योतिर्लिंग माहात्म्य से स्पष्ट है:-

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्री शैले मल्लिकार्जुनम्।

उज्जयिन्यां महाकालमोंड्कारे परमेश्वरम्॥

केदारे हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशंकरम्।

वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बंक गौतमीतटे॥

वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने।

सेतुबन्धे च रामेशं घृष्णेशं च शिवालये॥

एतानि ज्योतिर्लिंगानि प्रातरुत्थाय य: पठेत्।

जन्मान्तरकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥

उक्त द्वादश ज्योतिर्लिंगों में महाकालेश्वर का प्रमुख स्थान है। पुराणों के अनुसार महाकाल को ज्योतिर्लिंग के साथ-साथ समस्त मृत्युलोक के स्वामी के रूप में भी स्वीकार किया गया है:-

आकाशे तारकं लिगं पाताले हाटकेश्वरम्।

मृत्युलोके महाकालं लिंगत्रयं नमोस्तुते॥

इस प्रकार तीनों लोकों (आकाश, पाताल एवं मृत्यु लोक) के अलग-अलग अधिपतियों में समस्त मृत्यु लोक के अधिपति के रूप में महाकाल को नमन किया गया है। महाकाल शब्द से ही काल (समय) का संकेत मिलता है।

‘कालचक्र प्रवर्त्तको महाकाल:प्रतापन:’ कहकर कालगणना के प्रवर्त्तक रूप में महाकाल को स्वीकार किया गया है। महाकाल को ही काल-गणना का केन्द्र-बिन्दु मानने के अन्य कारण भी हैं। अवंतिका को भारत का मध्य-स्थान (नाभि क्षेत्र) माना गया है और उसमें भी महाकाल की स्थिति मणिपूर चक्र (नाभि) पर मानी गयी है।

आज्ञाचक्रं स्मृता काशी या बाला श्रुतिमूर्धानि।

स्वाधिष्ठानं स्मृता कांची मणिपूरमवंतिका॥

नाभिदेशे महाकालस्तन्नाम्ना तत्र वै हर:।

–वराहपुराण

(मणिपूर चक्र) योगियों के लिये कुंडलिनी है, कुंडलिनी जागृत करने की क्रिया योग के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानी जाती है, अत: मणिपूर चक्र पर स्थित भगवान महाकाल योगियों के लिये भी सिद्धस्थल हैं।

इसी प्रकार भूमध्यरेखा भौगोलिक कर्क रेखा को उज्जयिनी में ही काटती है, इसलिए भी समय गणना की सुगमता इस स्थान को प्राप्त है। कर्क रेखा तो स्पष्ट है ही, भूमध्य रेखा के लिए भी ज्योतिष के विभिन्न सिद्धांत ग्रंथों में प्रमाण उपलब्ध है:-

राक्षसालयदेवौक: शैलयोर्मध्यसूत्रगा:।

रोहीतकमवन्तीं च यथा सन्निहितं सर:॥

–सूर्यसिद्धांत

भास्कराचार्य पृथ्वी की मध्य रेखा का वर्णन इस प्रकार करते हैं:-

यल्लंकोज्जयिनीपुरोपरि कुरुक्षेत्रादिदेशान् स्पृशन्।

सूत्रं मेरुगतं बुधैर्निगदिता सा मध्यरेखा भुव:॥

जो रेखा लंका और उज्जयिनी में होकर कुरुक्षेत्र आदि देशों को स्पर्श करती हुई मेरु में जाकर मिलती है, उसे भूमि की मध्य रेखा कहते हैं। इस प्रकार भूमध्य रेखा लंका से सुमेरु के मध्य उज्जयिनी सहित अन्यान्य नगरों को स्पर्श करती जाती हैं, किन्तु वह कर्क रेखा को एक ही स्थान उज्जयिनी में, मध्य स्थल एवं नाभि (मणिपूर चक्र) स्थान पर काटती है, जहाँ स्वयंभू महाकाल विराजमान हैं। इसीलिये ज्योतिर्विज्ञान के सिद्धांतकार भारत के किसी भी क्षेत्र में जन्में हो अथवा उनका कार्य या रचना क्षेत्र कहीं भी रहा हो, सभी ने एकमत से कालचक्र प्रवर्तक महाकाल की नगरी उज्जयिनी को ही काल-गणना का केन्द्र स्वीकार किया था। आज भी भारतीय पंचांगकर्त्ता उज्जयिनी मध्यमोदय लेकर ही पंचांग की गणना करते हैं। इस प्रकार अदृश्य रूप से काल गणना के प्रवर्तक तथा प्रेरक महाकाल हैं।

दृश्य रूप में श्वास-निश्वास से लेकर दिन, मास, ऋतु, अयन एवं वर्ष की गणना का संबंध सूर्य से है। एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक एक दिन (दिन के सूक्ष्म विभाग घटी, पल, विपल आदि) और दिनों से मास, ऋतु वर्ष, युग-महायुग और कल्प आदि की गणना चलती रहती है। ऐसे अनेक कल्पों के संयोग (जो वाचनिक संख्याओं से परे हों) को ही महाकाल कहते हैं। सूर्य प्रतिदिन (24 घंटे में) एक उदय से दूसरे उदय पर्यन्त 360 अंश-21,600 कलाएँ चलता है, यही स्वस्थ मनुष्य की 24 घंटे में श्वासों की संख्या भी है। अर्थात् सूर्य की प्रत्येक कला के साथ मनुष्य के श्वास-निश्वास की क्रिया जुड़ी हुई है और सभी में आत्म-रूप से वह विद्यमान है। कहने का तात्पर्य यह कि काल-गणना में दृष्ट (सूर्य) अदृष्ट (महाकाल) में सामंजस्य है। महाकाल ज्योतिर्लिंग हैं और ज्योतिर्लिंग की दिव्य ज्योति के दर्शन चर्मचक्षु से नहीं होते; तप से प्राप्त दिव्य चक्षु से ही हो सकते हैं। सूर्य स्वत: अग्नितत्व, ज्योति के पुंज, तेज और प्रकाश का कारण हैं। अत: महाकाल ज्योतिर्लिंग हैं और सूर्य स्वत: ज्योति के पुंज हैं, महाकाल ही सूर्य हैं और सूर्य ही महाकाल हैं।

महाकालेश्वर के मंदिर में उदयादित्य के नागबन्धस्थ शिलालेख में महाकाल का जो ध्यान दिया गया है, उसमें महाकाल को प्रणव ( ओम्) स्वरूप माना है। वह पद्य इस प्रकार है:-

क्रीड़ाकुंडलितोरगेश्वरतनूकाराधिरुढाम्बरा

नुस्वारं कलयन्नकारुचिराकार: कृपार्द्र: प्रभु :।

विष्णोर्विश्वतनोरवन्तिनगरीहृत्पुण्डरीकेवसन्

ओंकाराक्षरमूर्तिरस्यतु महाकालोअंतकालं सताम्॥

अर्थात जिनका रुचिर आकार ही ‘अकार’ है। क्रीड़ा से कुण्डलित शेषनाग शरीर को जिन्होंने ‘उकार’ का रूप देकर आकाश को अनुस्वार के रूप में धारण किया है तथा विश्वरूप विष्णु के अवन्ति नगरीरूपी हृदयकमल में जो निवास करते हैं, ऐसे अक्षर (कभी नष्ट न होने वाली) मूर्ति, ओंकार के रूप में विराजमान, अपनी कृपा से द्रवित हृदय वाले प्रभु महाकाल सज्जनों के अन्तकाल को दूर भगावें।

इस प्रकार समस्त भूलोक के स्वामी, काल-गणना के केन्द्र-बिन्दु योगियों की कुंडलिनी नाभि पर स्थित और स्वत: प्रणवस्वरूप होने से ही श्री महाकाल प्रमुख ज्योतिर्लिंग हैं।

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