आत्महत्याओं के मामले प्रदेश छठवें स्थान पर

आत्महत्याओं के मामले प्रदेश छठवें स्थान पर
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राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र
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भोपाल । राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा करते हुए कार्यवाहक विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष बाला बच्चन ने सरकार को कई मुद्दों पर घेरा लेकिन बाद में उसका जवाब देते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आंकड़ेबाजी के साथ-साथ प्रदेश के कई मामलों में नम्बर होने के जो आंकड़े दिये लेकिन उन प्रगति के आंकड़ों के साथ-साथ उन्होंने सदन में यह जानकारी देना उचित नहीं समझा कि जहां मध्यप्रदेश में चल रही कई योजनाओं में नम्बर वन के स्तर पर है तो वहीं प्रदेश में बलात्कार की घटनायें किसानों द्वारा आत्महत्या करने के मामले और नाबालिगों के साथ आये दिन हो रहे बलात्कार, राजधानी से लेकर दूरदराज के क्षेत्र में आये दिन घट रही चैन खींचने की घटनाएं और लूट व डकैती की घटनाओं के साथ-साथ करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाने के बावजूद भी प्रदेश से कुपोषण का कलंक यह सरकार नहीं धो पाई तो वहीं सरकारी योजनाओं और अव्यवस्थाओं के चलते प्रदेश में ४२ प्रतिशत बच्चे बौने हो रहे हैं कुल मिलाकर उन्होंने जो प्रगति के आंकड़े सदन में प्रस्तुत करके अपनी पीठ थपथपाने का काम किया वह तो सभी राजनीतिक दलों के नेता करते हैं लेकिन उन आंकड़ों के बाद भी प्रदेश की स्थिति यह है कि कई मामलों में नम्बर वन है तो वहीं देश के आत्महत्याओं के मामले में मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी लगातार बढ़ती जा रही है, इस तरह का खुलासा किसी विपक्षी दल या नेता द्वारा नहीं बल्कि एनसीआरबी २०१४ के रिकार्ड के अनुसार प्रदेश में नौ हजार ३९ आत्महत्याओं के साथ प्रदेश आत्महत्याओं के मामले में छठवें पायदान पर है कुल आत्महत्याओं में इसका प्रतिशत ६.९ है, आत्महत्याओं के मामले में सबसे अधिक संख्या महाराष्ट्र की है तो वहीं सबसे कम नागालैण्ड में सिर्फ ६१ आत्महत्याओं के मामले सामने आए हैं। मजे की बात यह है कि एनसीआरबी ने जो आंकड़े प्रस्तुत किये वह आंकड़े भी २००४ और २००५ यानि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सत्ता में काबिज होने के वर्ष से इस रिपोर्ट में खुलासा किया, इन वर्षों में आत्महत्या करने वालों की संख्या में लगभग सात प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। तो वहीं इसी क्रम में वर्ष २०१४ के आंकड़े पर गौर करें, तो प्रदेश में लगभग दो हजार गृहणियों ने आत्महत्या की है। इसके पीछे कई कारण बताये गये हैं, जैसे पारिवारिक वातावरण, पारिवारिक पृष्ठभूमि, पिछला मनोरोग का इतिहास, घरेलू हिंसा, स्वास्थ्य, दहेज उत्पीडऩ, वैवाहिक जीवन से असंतुष्ट, अवसाद, पुरुष प्रधान समाज द्वारा कलंक आदि आत्महत्या की प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। जबकि कामकाजी महिलाएं आत्महत्या करने में पुरुषों की अपेक्षा कम हैं। इस वर्ष जहां ४२८ कामकाजी पुरुषों ने आत्महत्या की, तो ८१ महिलाओं ने अपना जी वन समाप्त करने का निर्णय लिया। आत्महत्या के मामले में छात्रों की स्थिति भी भयावह है। लड़कों की अपेक्षा लड़कियों ने इस वर्श अधिक आत्महत्या की है, उनकी संख्या जहां ३४५ है, वहीं लड़कों की संख्या ३०० है। आत्महत्या के पीछे बेरोजगारी भी एक बड़ी वजह रही है। २०१४ में कुल ३३३ बेरोजगारों ने आत्महत्या की है, इनमें महिलाओं की संख्या ५० है। सबसे अधिक निजी व्यवसाय, कृषक और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों वाले लोगों ने आत्महत्या की है। इनकी संख्या एक हजार, ८८५ है। इनमें महिलाओं की संख्या ३३६ है। जानकार बताते हैं कि लगातार पिछले दो-तीन वर्षों में किसानों द्वारा आत्महत्या की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। फसल नष्ट होने और बढ़ती कर्ज और अन्य विकल्प न होना आत्महत्या का मुख्य कारण माना जा रहा है। सरकार की ओर से मिलने वाला राहत पैकेज भी इनकी जान नहीं बचा पा रही है। इसके पीछे भ्रष्टाचार बहुत बड़ी वजह है। वहीं दैनिक वेतन भोगी एक हजार २४८ आत्महत्या करने वालों में महिलाओं की संख्या १४२ है। इसी तरह सेवा निवृत्त के बाद कुल १८ आत्महत्या करने वालों में से महिलाओं की संख्या पांच है। अगर अन्य पर गौर करें, तो दो हजार २२७ आत्महत्याओं में महिलाओं की संख्या ५६५ है।

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