आत्मा कभी भी मरती नहीं है वे केवल शरीर बदलती हैं- मुनिश्री

बुरहानपुर। भक्ति कैसी हैं, परम प्रेम व अमृत स्वरुपा हैं। यानी जो जीव अंक बार भक्ति के सागर में उतर जाता हैं तो वे अमृतत्व को पा लेता हैं। भक्ति की गहराई में हम जितना चले जाये तो भक्त और भगवान में भेद नहीं रह जायेगा। भक्ति करने से वह अमर को पा सकता है। आत्मा कभी भी मरती नहीं है वे केवल शरीर बदलती है। वे शरीर बदलकर नये रुप को धारण करती है, आज जो हम पढ़ाई, लिखाई, कमाई, ऐशो आराम कि वस्तुये खरीद रहे है।

नये व आलीशान मकान बनारहे वे केवल इस शरीर के लिए कर रहे है। शरीर मरा ही हुआ है, जो पहले से ही मरा हुआ है वह मरता नहीं है। आत्मा के लिए शरीर एक नये कपड़े के समान है। आत्मा अमर है, यदी मनुष्य को बहुत प्यास लगी हो ओर पीने का पानी ना हो और केवल घोबी घाट पर पानी हो तो वह जल पीकर भी अपनी प्यास बुझा ले लेता है। आज जो भी सूख दिख रहा है वह लौकिक सुख है। परमात्मा की भक्ति के अलावा कोई भी सुख नहीं हो सकता है। श्री इन्द्रध्वज महामंड़ल विधान के प्रथम दिन आचार्यश्री 108 विशुघ्द सागर महाराज की परम शिष्य मुनिश्री 108 प्रमेयसागर महाराज ने इन्द्र महल राजस्थान भवन में सुबह 10 बजे कहे। पंकज व संदीप जैन ने बताया कि सुबह 6:30 बजे जाप्यानुष्ठान, श्रीजी अभिषेक, शांतिधारा इन्द्र जम्बुकुमार पहाडिय़ा व सुभाष ईशान मालेगांव वालो ने की।

मंड़ल विधान पर मंगल कलश व नेवद कोण कलश स्थापना पवन हिम्मत पाटौदी, ईशान कोण कलश भवरीदेवी बाबुलाल सेठी, अग्नि कोण कलश चन्द्रशेखर जटाले, वायद कोण कलश सागरमल सुभाष सेठी, अखंड़ दीप प्रज्जवलन प्रमोद जयेश जैन को प्राप्त हुआ। पंडि़त नरेश जैन ने विधी विधान से अभिषेक, कलश स्थापना, नित्य नियम पूजन व संगीकमय मंड़ल विधान की पूजन की। अष्ट प्रतिहार्य व अष्ट मंगल की स्थापना मंड़ल पर किए गये। सागर संगीतकार सुधीर जैन ने भक्तिमय भजनो पर समाजजन थिरके। सायंकाल की महाआरती का सौभाग्य पलक जयेश जैन को प्राप्त हुई।

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